500% टैरिफ की धमकी के बाद अमेरिका ने बदला रुख, भारत पर अब 100% शुल्क लगाने की तैयारी?

US Tariff Threat India: रूस से कच्चा तेल और गैस खरीदने को लेकर भारत पर सख्त कार्रवाई की तैयारी कर रहे अमेरिका के रुख में अब नरमी देखने को मिल रही है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिका ने भारत पर प्रस्तावित 500% टैरिफ की जगह अब 100% अतिरिक्त शुल्क लगाने का संशोधित प्रस्ताव तैयार किया है। इससे पहले ट्रंप प्रशासन ने अमेरिकी कांग्रेस में एक विधेयक का समर्थन किया था, जिसमें भारत पर 500% टैरिफ लगाने की बात कही गई थी।

नए बिल में भारत और चीन को बड़ी राहत

रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिकी सीनेट में रूस प्रतिबंध (Russia Sanctions) से जुड़े विधेयक का नया मसौदा पेश किया गया है। संशोधित बिल में रूस से तेल खरीदने वाले भारत और चीन जैसे देशों पर प्रस्तावित टैरिफ को काफी कम कर दिया गया है। पहले जहां 500% तक का व्यापक टैरिफ प्रस्तावित था, वहीं अब इसकी अधिकतम सीमा 100% कर दी गई है।

अमेरिका ने क्यों बदला रुख?

जानकारी के अनुसार, इस बिल को रिपब्लिकन और डेमोक्रेट—दोनों दलों के सांसदों का समर्थन मिला है। अमेरिका का कहना है कि रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देश अप्रत्यक्ष रूप से रूस की अर्थव्यवस्था को मजबूत कर रहे हैं। अमेरिका पहले भी भारत पर आरोप लगा चुका है कि वह रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदकर रूस को आर्थिक लाभ पहुंचा रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि 500% टैरिफ लागू किया जाता, तो वैश्विक तेल बाजार में बड़ा संकट पैदा हो सकता था। साथ ही भारत और चीन जैसे प्रमुख व्यापारिक साझेदारों के साथ अमेरिका के संबंध भी प्रभावित हो सकते थे। इसके अलावा भारत-अमेरिका व्यापार समझौते (Trade Deal) पर चल रही बातचीत पर भी इसका नकारात्मक असर पड़ सकता था। इन्हीं कारणों से अमेरिका ने अपने रुख में नरमी दिखाई है।

बिल में संशोधन के बाद नई रणनीति

नए प्रस्ताव के अनुसार, अमेरिका उन देशों पर दबाव बनाए रखना चाहता है जो रूस से बड़े पैमाने पर तेल और गैस खरीद रहे हैं, लेकिन अब पहले जैसी कठोर कार्रवाई की बजाय सीमित टैरिफ का विकल्प अपनाया गया है।

किन देशों पर रहेगी अमेरिका की नजर?

अमेरिकी सीनेट से जुड़े सूत्रों के अनुसार, यह विधेयक मुख्य रूप से उन देशों को निशाना बनाता है जो रूस से सबसे अधिक कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस खरीदते हैं। इनमें भारत, चीन, हंगरी, स्लोवाकिया, अज़रबैजान, फ्रांस, जापान और बेल्जियम जैसे देशों के नाम शामिल हैं। हालांकि, जो देश रूस पर अपनी ऊर्जा निर्भरता कम करने के लिए ठोस कदम उठा रहे हैं, उन्हें इस प्रस्तावित कार्रवाई में राहत मिल सकती है।

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