ईरान की नई रणनीति पड़ रही भारी? क्या दुश्मनों से लड़ते-लड़ते अपने ही मित्र देशों को बना रहा है विरोधी

Iran-US War: अमेरिका और ईरान के बीच जारी सैन्य तनाव अब पूरे पश्चिम एशिया को अपनी चपेट में लेता दिखाई दे रहा है। इस बार संघर्ष का दायरा केवल अमेरिका तक सीमित नहीं रहा, बल्कि ईरान ने कतर, बहरीन, कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), जॉर्डन, इराक और सऊदी अरब जैसे पड़ोसी देशों को भी निशाना बनाना शुरू कर दिया है। इससे क्षेत्रीय हालात और अधिक गंभीर हो गए हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान की यह रणनीति उसे सैन्य मोर्चे पर फायदा पहुंचाने के बजाय कूटनीतिक रूप से अलग-थलग कर सकती है, क्योंकि जिन देशों ने अब तक मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी, वे भी उससे दूरी बनाने लगे हैं।

कतर पर हमलों से बदले समीकरण

खाड़ी देशों में कतर लंबे समय से अमेरिका और ईरान के बीच संवाद स्थापित करने की भूमिका निभाता रहा है। एक ओर कतर में अमेरिका का सबसे बड़ा सैन्य अड्डा अल-उदीद एयर बेस मौजूद है, वहीं दूसरी ओर उसके ईरान के साथ भी अच्छे संबंध रहे हैं।

लेकिन मौजूदा संघर्ष में ईरान द्वारा कतर की ओर ड्रोन और मिसाइल हमले किए जाने के बाद कतर ने इसे अपनी सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बताया है। इसके बाद कतर ने अमेरिका के साथ सुरक्षा सहयोग को और मजबूत करने का फैसला किया है।

पाकिस्तान भी दुविधा में

हाल ही में पाकिस्तान और कतर के बीच सुरक्षा सहयोग को लेकर समझौता हुआ था। ऐसे में कतर पर बढ़ते खतरे के बीच पाकिस्तान पर भी दबाव बढ़ गया है।

पाकिस्तान पहले अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता की कोशिश कर रहा था, लेकिन अब उसने सऊदी अरब की सुरक्षा को प्राथमिकता बताते हुए सभी पक्षों से शांति बनाए रखने की अपील की है। इससे संकेत मिल रहे हैं कि पाकिस्तान भी मध्यस्थ की भूमिका से पीछे हट सकता है।

ओमान की मध्यस्थता पर भी असर

ओमान लंबे समय से अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता कराने वाला प्रमुख देश रहा है। हालांकि क्षेत्र में बढ़ते सैन्य तनाव और लगातार हो रहे हमलों के कारण उसकी मध्यस्थता भी कमजोर पड़ती दिखाई दे रही है।

ईरान का मकसद क्या है?

विशेषज्ञों के अनुसार, ईरान खाड़ी क्षेत्र के देशों को यह संदेश देना चाहता है कि यदि उसके खिलाफ सैन्य कार्रवाई हुई तो उसका जवाब केवल अमेरिका या इज़रायल तक सीमित नहीं रहेगा।

इसी रणनीति के तहत ईरान हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य पर अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा है और चाहता है कि वहां से गुजरने वाले जहाज उसकी शर्तों के अनुसार आवाजाही करें।

क्या ईरान खुद को कूटनीतिक रूप से अलग-थलग कर रहा है?

कई अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि ईरान के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती केवल अमेरिका नहीं, बल्कि उसके वे पारंपरिक सहयोगी भी हैं जो अब उससे दूरी बना रहे हैं।

कतर अमेरिका के और करीब जा रहा है, पाकिस्तान दबाव में है और ओमान की मध्यस्थता भी कमजोर पड़ रही है। ऐसे में ईरान के लिए भविष्य में बातचीत और कूटनीतिक समाधान के विकल्प लगातार सीमित होते जा रहे हैं।

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि मध्यस्थ देश भी ईरान से दूरी बना लेते हैं, तो भविष्य में तनाव कम कराने और वार्ता की नई पहल कौन करेगा?

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